प्रयागराज।आजादी के सात दशक बाद भी भारत की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां समाधान की दिशा में ठोस प्रगति के बजाय समस्याएं और जटिल होती जा रही हैं| एक ओर अभिभावक अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए कर्ज लेकर भी बेहतर शिक्षा की व्यवस्था में जुटे हैं ,वहीं दूसरी ओर शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर व्यापक असंतोष दिखाई देता है| यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था और जवाबदेही के संकट को भी दर्शाती है।केंद्र सरकार के अधीन नवोदय केंद्रीय और सैनिक विद्यालय में निसंदेह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रतीक हैं, लेकिन उनकी पहुंच बेहद सीमित है। लाखों छात्रों में से केवल कुछ को ही अवसर मिल पाता है, जिससे शिक्षा में समानता का सिद्धांत प्रभावित होता है। क्या अच्छी शिक्षा केवल चुनिंदा छात्रों का अधिकार बनकर रह जाएगी?दूसरी ओर, राज्य सरकारों की स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद पढ़ाई का स्तर अपेक्षित नहीं है। कई स्थानों पर शिक्षक केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। जवाबदेही की कमी और निगरानी की कमजोरी ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है, जिसके कारण अभिभावकों का भरोसा लगातार काम होता जा रहा है।इसी अविश्वास के बीच निजी विद्यालयों का विस्तार हुआ है| निजी स्कूलों ने विकल्प तो दिए हैं, लेकिन शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण चिंता का विषय है| ऊंची फीस और अनियंत्रित शुल्क वृद्धि ने अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है।शिक्षा अब अधिकार कम और खर्च अधिक लगने लगी है।ऐसे में सरकार की भूमिका निर्णायक है।जरूरी है कि सरकारी और निजी दोनों प्रकार के स्कूलों की सख्त और पारदर्शी निगरानी हो।केवल भवन और संसाधन पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षकों की गुणवत्ता, प्रशिक्षण और विद्यार्थियों के सीखने के परिणामों पर भी ध्यान देना होगा।साथ ही, उत्कृष्ट संस्थाधनों की संख्या और पहुंच बढ़ानी होगी, ताकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सभी तक पहुंच सके। तकनीक, स्थानीय नवाचार और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।अंततः कहना है कि शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है| यदि आज इस क्षेत्र में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढियो का भविष्य संकट में पड़ सकता है| अब समय है कि सरकार, समाज और शिक्षा संस्थान मिलकर एक संतुलित, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करें।






