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गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार : ‘इच्छा मृत्यु’ और ‘लिविंग विल’ पर सुप्रीम कोर्ट की नई दिशा

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गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार : ‘इच्छा मृत्यु’ और ‘लिविंग विल’ पर सुप्रीम कोर्ट की नई दिशागरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार : ‘इच्छा मृत्यु’ और ‘लिविंग विल’ पर सुप्रीम कोर्ट की नई दिशा

▪️सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अर्चना द्विवेदी ने बताया प्रक्रिया, सीमाएँ और अलग संसदीय कानून की जरूरत

______________साक्षात्कार_____________

▪️साक्षात्कारकर्ता: अलीम उद्दीन, संपादक

▪️विशेषज्ञ: अर्चना द्विवेदी (अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)

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  • नई दिल्ली/लखनऊ। हाल के वर्षों में ‘इच्छा मृत्यु’ (Euthanasia) और ‘लिविंग विल’ को लेकर उच्चतम न्यायालय के निर्णयों ने देश में एक नई कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दिया है। इन्हीं जटिल कानूनी पहलुओं को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट की जानी-मानी अधिवक्ता अर्चना द्विवेदी से विशेष बातचीत की गई।

 

▪️साक्षात्कारकर्ता: अर्चना जी, सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में ‘गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार’ को अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना है। एक कानूनविद् के रूप में आप इसे कैसे देखती हैं?

▪️ अर्चना द्विवेदी : अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार देता है, लेकिन न्यायालय के अनुसार जीवन का अर्थ केवल साँस लेना नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीना है। जब कोई व्यक्ति केवल मशीनों के सहारे हो और ठीक होने की उम्मीद न हो, तो उसे कष्टपूर्ण जीवन के लिए मजबूर करना उसकी गरिमा के विरुद्ध है। इसी कारण कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को संवैधानिक मान्यता दी है।

 

▪️साक्षात्कारकर्ता: ‘लिविंग विल’ को लेकर लोगों में काफी भ्रम है। क्या आप इसकी कानूनी प्रक्रिया सरल शब्दों में बता सकती हैं?

▪️अर्चना द्विवेदी: ‘लिविंग विल’ एक अग्रिम चिकित्सा निर्देश है, जिसमें कोई भी व्यक्ति स्वस्थ अवस्था में यह लिखित रूप से तय कर सकता है कि असाध्य बीमारी या कोमा की स्थिति में उसे कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाए। 2023 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसकी प्रक्रिया सरल हो गई है—अब इसे केवल किसी राजपत्रित अधिकारी या नोटरी के समक्ष प्रमाणित कराना पर्याप्त है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: क्या परिवार की सहमति के बिना भी इच्छा मृत्यु संभव है? इसमें कानूनी पेच क्या हैं?

 

▪️अर्चना द्विवेदी: यदि मरीज ने पहले से ‘लिविंग विल’ बनाई है तो उसकी इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। लेकिन यदि ऐसी कोई ‘विल’ नहीं है, तो परिवार और डॉक्टरों की सहमति आवश्यक होती है। इसके लिए अस्पताल में दो मेडिकल बोर्ड—प्राइमरी और सेकेंडरी (विशेषज्ञ डॉक्टरों का)—गठित किए जाते हैं। दोनों बोर्ड यदि इलाज को निरर्थक मानते हैं, तभी आगे की प्रक्रिया शुरू होती है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: इस कानून के दुरुपयोग, खासकर संपत्ति या निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल होने की आशंका को कानून कैसे रोकता है?

▪️अर्चना द्विवेदी: यह चिंता वाजिब है, इसलिए कानून में कड़े सुरक्षा प्रावधान रखे गए हैं। ‘सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड’ में जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा नामित डॉक्टóर शामिल होते हैं और अस्पताल को जिला मजिस्ट्रेट को भी सूचना देनी होती है। यह त्रि-स्तरीय व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि फैसला केवल चिकित्सीय आधार पर हो, किसी निजी लाभ के लिए नहीं।

▪️साक्षात्कारकर्ता: क्या आपको लगता है कि ‘इच्छा मृत्यु’ के विषय में अब भारत में एक स्पष्ट और व्यापक संसदीय कानून बनाया जाना चाहिए?

▪️अर्चना द्विवेदी: बिल्कुल। अभी यह व्यवस्था केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों पर आधारित है। यदि इस विषय पर स्पष्ट संसदीय कानून बनता है, तो डॉक्टरों का कानूनी भय कम होगा और पूरे देश में प्रक्रिया में एकरूपता आएगी। समाज, नैतिकता और चिकित्सा के बीच संतुलन के लिए ‘एंड-ऑफ-लाइफ केयर’ पर व्यापक कानून समय की जरूरत है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: क्या ‘इच्छा मृत्यु’ का अधिकार केवल शारीरिक बीमारियों तक सीमित है, या मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति भी इसकी मांग कर सकता है?

▪️अर्चना द्विवेदी: भारत में कानून इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है। ‘इच्छा मृत्यु’ केवल उन परिस्थितियों में संभव है जहाँ व्यक्ति असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो और ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) यानी कोमा जैसी स्थिति में हो। मानसिक बीमारी या अवसाद के आधार पर इसकी अनुमति नहीं है। ऐसे मामलों को कानून ‘आत्महत्या’ की श्रेणी में रखता है, न कि ‘इच्छा मृत्यु’ में।

▪️साक्षात्कारकर्ता: यदि अस्पताल का मेडिकल बोर्ड इच्छा मृत्यु की अनुमति देने से इनकार कर दे, तो परिवार के पास क्या कानूनी विकल्प बचते हैं?

▪️अर्चना द्विवेदी: ऐसी स्थिति में परिवार उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर अदालत स्वतंत्र विशेषज्ञों का मेडिकल बोर्ड गठित कर मानवीय आधार पर फैसला दे सकती है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: क्या ‘लिविंग विल’ बनाने के बाद व्यक्ति उसे भविष्य में बदल या रद्द कर सकता है?

▪️अर्चना द्विवेदी: बिल्कुल। कानून व्यक्ति को अपनी ‘लिविंग विल’ को कभी भी संशोधित या रद्द करने का अधिकार देता है। यदि व्यक्ति सचेत अवस्था में अपनी इच्छा बदलना चाहता है, तो वह लिखित रूप में इसे वापस ले सकता है। उसकी वर्तमान इच्छा ही अंतिम मानी जाएगी।

▪️साक्षात्कारकर्ता: डॉक्टरों के मन में अक्सर कानूनी कार्रवाई का डर रहता है। क्या ‘पैसिव यूथेनेशिया’ अपनाने वाले डॉक्टर को कानूनी सुरक्षा मिलती है?

▪️अर्चना द्विवेदी: हाँ, यदि डॉक्टर सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित दिशा-निर्देशों और मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया का पालन करते हैं, तो उन्हें किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्रवाई से कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: क्या ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (जहर का इंजेक्शन देकर मृत्यु) को भारत में कभी कानूनी मान्यता मिलने की संभावना है?

▪️अर्चना द्विवेदी: इसकी संभावना बेहद कम है। दुनिया के कुछ ही देशों, जैसे नीदरलैंड्स, में यह वैध है। भारत जैसे विशाल और जटिल सामाजिक ढांचे वाले देश में इसके दुरुपयोग की आशंका अधिक है, इसलिए हमारी न्यायपालिका जीवन की पवित्रता और मृत्यु की गरिमा के बीच संतुलन बनाए रखने के पक्ष में है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: गरीब मरीजों के लिए यह प्रक्रिया कितनी व्यावहारिक है? क्या कोर्ट जाना महंगा नहीं पड़ता?

▪️अर्चना द्विवेदी: 2023 के सुधारों के बाद अब हर मामले में कोर्ट जाना जरूरी नहीं है। यदि अस्पताल का मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के अधिकारी सहमत हों, तो प्रक्रिया अस्पताल स्तर पर ही पूरी हो सकती है। हालांकि जागरूकता की कमी के कारण गरीब परिवारों के लिए यह अभी भी चुनौती बनी हुई है।

▪️साक्षात्कारकर्ता: अंत में, इस कानून को लेकर समाज के लिए आपका क्या संदेश है?

▪️अर्चना द्विवेदी: समाज को समझना होगा कि ‘इच्छा मृत्यु’ जीवन समाप्त करने का रास्ता नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई का माध्यम है। ‘लिविंग विल’ जैसे प्रावधानों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए ताकि किसी व्यक्ति को जीवन के अंतिम क्षणों में मशीनों के सहारे तड़पने के बजाय शांतिपूर्ण विदाई मिल सके।

▪️साक्षात्कारकर्ता: अर्चना जी, इस संवेदनशील और जटिल विषय पर हमारे पाठकों को इतनी स्पष्ट जानकारी देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

▪️अर्चना द्विवेदी: धन्यवाद। मुझे खुशी है कि इस साक्षात्कार के माध्यम से हम इस महत्वपूर्ण विषय को समाज तक पहुँचा पा रहे हैं। इस पर खुला संवाद होना समय की जरूरत है।

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