राजदेव द्विवेदी

प्रयागराज। जनपद से लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में आज के समय में पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, खुद असुरक्षा और डर के साए में जी रही है। सरकारें बीच-बीच में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गाइडलाइंस जारी करती हैं और बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। हत्या, मारपीट और फर्जी मुकदमे पत्रकारों की सुरक्षा के खोखले दावों को उजागर कर रहे हैं। जो पत्रकार समाज के लिए दिन-रात काम करते हैं, चाहे बारिश हो, तूफान हो, या अन्य कठिन परिस्थितियाँ हों, वे आज खुद असुरक्षित हैं। आए दिन पत्रकारों पर हमले होते हैं, उनकी हत्याओं की खबरें सामने आती हैं, और जो सच्चाई की आवाज़ उठाते हैं, उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं। पुलिस और प्रशासन का रवैया भी पत्रकारों के प्रति दमनकारी होता जा रहा है, जो उन्हें अपनी जिम्मेदारियां निभाने से रोकता है। सरकारें सुरक्षा का दावा तो करती हैं, लेकिन जब पत्रकारों पर फर्जी मुकदमे दर्ज होते हैं, तो यह सवाल उठता है कि सरकार और पुलिस किसके साथ खड़ी है। कई बार पुलिस खुद पत्रकारों पर झूठे मुकदमे दर्ज करती है ताकि उनकी आवाज़ को दबाया जा सके। सरकार की गाइडलाइंस और घोषणाएं केवल कागजों पर रह जाती हैं, और पत्रकारों के लिए कोई ठोस सुरक्षा उपाय नहीं किए जाते। जब सच्चाई उजागर करने वाले पत्रकारों पर हमले और फर्जी मुकदमे होते हैं, तो यह साफ दिखता है कि सच्चाई को दबाने की कोशिश की जा रही है। जो लोग भ्रष्टाचार, अन्याय और समाज की समस्याओं को उजागर करते हैं, उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष कानून बनाए जाने चाहिए, जिनमें हमलों और फर्जी मुकदमों के खिलाफ सख्त प्रावधान हों। फर्जी मुकदमे दर्ज करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और इन मामलों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन को पत्रकारों पर हमलों और झूठे मामलों में जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। साथ ही, पत्रकारों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल और हेल्पलाइन लागू की जानी चाहिए।आज जब पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो लोकतंत्र की बुनियाद कैसे मजबूत होगी? जो लोग समाज की समस्याओं को उजागर करते हैं, उन्हें दबाने की कोशिश लोकतंत्र के लिए खतरा है। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि पत्रकारों की सुरक्षा केवल उनका अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है। सवाल यह है कि क्या सरकार और पुलिस पत्रकारों के साथ खड़ी होगी, या उन्हें असुरक्षा के साये में छोड़ देगी?

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