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अज्ञानी की संगत में जर्जर होती है भक्ति: शब्दानंद जी महराज

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अज्ञानी की संगत में जर्जर होती है भक्ति: शब्दानंद जी महराज

चकटोडर में शेषपति तिवारी के यहां श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ

आशीष पाठक

ज्ञानपुर। क्षेत्र के चेकटोडर में मुख्य यजमान शेषपति त्रिपाठी के यहां चल रहे श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान शनिवार को भक्ति प्रसंग की चर्चा करते हुए शब्दानंद जी महाराज ने कहा कि नाम रूपी धन के वश में भक्ति पैदा होती है। क्रिया रूपी कर्नाटक में बढ़ती है। परम लोक रूपी महाराष्ट्र में विशेष रूप से पल्लवित होती है, किंतु अज्ञानी रूपी गुजरात में पहुंचकर अर्थात अज्ञानी की संगत से भक्ति जर्जर होती है। भागवत की कथा से भक्ति ज्ञान और वैराग्य तीनों चैतन्य होते हैं। भगवान कपिल देव ने माता देवहूति को साख्य योग का उपदेश देते हुए परम तत्व का बोध कराया। महाराज जी ने पूरूजनों पाख्यान के माध्यम से शरीर को ही पुरूज्जनपुरी एवं जीव को पूरूज्जन बताया। जीव दुख भाव का चिंतन करता हुआ शरीर छोड़ता है। उसी शरीर को प्राप्त होता है। इसलिए मानव मात्र को संसार में रहते हुए अंदर से चिंतन परमात्मा का ही करना चाहिए। इससे लोक और परलोक दोनों बनता है। कथा प्रवचन के दौरान उपस्थित भक्त जनों में लक्ष्मीकांत तिवारी, उदय शंकर तिवारी, गुलाब धर तिवारी, अनिल कुमार तिवारी, ओंकार नाथ तिवारी, अरुण तिवारी, वॉचस्पति तिवारी, सुनील तिवारी सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

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