ग्रामीणों की सेवा में जुटे प्रधानी के दावेदार

पंचायत चुनाव के आहट से प्रधानों के बदल गए सुर

शुरू हुआ लॉलीपॉप का खेल, जिसके घर में जितने वोट उसकी उतनी सेवा

राजदेव द्विवेदी

प्रयागराज। ग्राम पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट बढ़ गई है मौजूदा प्रधान और इस बार अपनी किस्मत आजमाने को तैयार हो रहे प्रत्याशियों की गांवों में हलचल तेज हो गई है। ग्राम पंचायत चुनाव से पहले क्या है गांव का हाल चुनाव को लेकर क्या कह रहे हैं ग्रामीण पढिए पूरी रिपोर्ट–साल 2026 में होने वाले ग्राम पंचायत को चुनावों को लेकर सर गर्मियां तेज हैं। हाला कि चुनाव की तारीखों का शेड्यूल अभी ऐलान नहीं किया गया है लेकिन दावेदारों ने अभी से ताकत लगा रखी है। गांव के चौक चौराहों पर गांव के नुक्कड़ों और चौपालों में बैठकें सजने लगी हैं। दावेदार मतदाताओं के सुख दुख में भागीदार होकर उनकी सेवा में जुट गए हैं। ऐसे में विद्रोही सामना टीम ने गांव का हाल जानने के लिए गांव के गलियों की ओर रुख किया। दूसरी बार प्रधानी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे एक नौजवान दावेदार से भेंट हो गई। दावेदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि प्रधानी का चुनाव विधायकी के चुनाव से ज्यादा मुश्किल है। गांव में एक-एक वोट का हिसाब रखना और लोगों को समझाने में पिछले 1 साल से हमारा पूरा समय इसी में जा रहा है। वह दावेदार समय के बारे में तो बताते हैं लेकिन कितना खर्च हुआ इस पर कुछ नहीं बोलते, बस इतना कहते हैं कि गांव वालों की सेवा में दिन-रात लगे हैं। सुबह से शाम तक लोगों के काम करवाने की कोशिश करता हूं जो हमसे बन पड़ता है वह हम लोगों के लिए करते हैं अगर हमारी पंचायत के लोगों ने हमें एक मौका दिया तो हर समस्या का निदान करूंगा। हाला कि गांव में इन दिनों लोग धान की रोपाई में लगे हुए हैं। नई फसल की बुवाई के साथ ही प्रधानी के चुनाव को लेकर बैठकों का दौर भी चल रहा है। फिर कारवां आगे बढ़ा चाय की गुमटी और मिठाई की दुकानों पर चुनाव के ही चर्चे सुनने को मिले। कोयले की भट्टी पर चाय को खौलाते हुए एक बुजुर्ग ने हल्के फुल्के अंदाज में कहा कि आजकल प्रधान की मोटरसाइकिल की टंकी बिल्कुल फुल रहती है। प्रधान किसी को ना नहीं कहते हैं अस्पताल से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक जिसको जहां जाना होता है प्रधान तैयार हैं। दुकान पर बैठे और लोग उनकी हां में हां मिलाते हैं तो इसी बीच प्रधान पद के एक उम्मीदवार तपाक से कहते हैं जब जनता हमका प्रधान बनाई तो जनता की सेवा के लिए जो कुछ होई हम जरूर करब। खुले शब्दों में कोई कुछ नहीं बोलता है लेकिन दबे शब्दों में कई लोग बताते हैं कि कैसे प्रधानी के दावेदारों की गाड़ियां इन दिनों टैक्सी नजर आती है तो शराब और मुर्गों की पार्टियां भी चलती है। इसी बीच शांति को भंग करते हुए एक बुजुर्ग ने कहा कि 4 साल तक सीधे मुंह बात न करने वाले प्रधान लोगों के घर-घर जाकर दिक्कतें पूछ रहे हैं। हमने अपने जीवन के 70 सावन गुजारे हैं लेकिन हाल वही हैं प्रधानों के क्या हुआ वादों का, कसमों का, चुनाव संपन्न होने के बाद जिनको हम सलामी ठोकते थे तो पलट कर उनका जवाब नहीं मिलता था आज पांव छूकर आशीर्वाद ले रहे हैं सब समय का तगाजा है। पंचायत चुनाव के समय आते ही स्थानीय प्रधानों के सुर में अचानक बदलाव देखा जा रहा है। चुनावी मौसम के इस दौर में प्रधानों द्वारा अपने समर्थकों और वोटरों को आकर्षित करने के लिए विभिन्न वादे और लाभ प्रदान करने का लॉलीपॉप का खेल शुरू हो गया है। इसी बीच एक नौजवान के स्वर टूटे और बोल पड़े इस तरह की राजनीति से चुनावी प्रक्रिया पर असर पड़ता है और मतदाताओं को भ्रमित किया जाता है। मगर इस बार हम लोग भ्रमित होने वाले नहीं है क्योंकि अब नए युग का भारत है। बहरहाल हमारी टीम इन मुद्दों पर नजर रख रही है आने वाले चुनावी समय में देखेंगे कि चुनावी प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती है और स्थानीय प्रशासन इस स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया करता है। अगले अंक में फिर विद्रोही सामना टीम गांव के गलियों में भ्रमण कर लोगों के विचारों से मुखातिब होगी। ग्रामीणों की जुबानी प्रधान की कहानी के अंक को लेकर समाचार पत्र के माध्यम से क्षेत्रीय जनों तक पहुंचाने का भरसक प्रयत्न करेंगे।

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